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सतनकुलम कस्टोडियल मौत का भयावह सच: महिला हेड कांस्टेबल रेवती की बहादुरी ने 9 पुलिसवालों को दिलाई फांसी की सजा | पूरी कहानी, गवाही और न्याय का ऐतिहासिक फैसला

देहरादून/मदुरै, 12 अप्रैल 2026 – तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में स्थित छोटा सा कस्बा सतनकुलम। 19 जून 2020 की रात। कोविड-19 लॉकडाउन का सख्ती भरा वक्त। एक पिता और बेटे – पी. जयराज (58 वर्ष) और जे. बेन्निक्स (31 वर्ष) – अपनी मोबाइल शॉप और वुड वर्कशॉप के छोटे-मोटे काम में लगे थे। लेकिन पुलिस की नजर में वे “लॉकडाउन नियम तोड़ने वाले” थे। कुछ घंटों बाद दोनों पुलिस स्टेशन में घुस गए और कभी बाहर नहीं निकले। तीन दिन बाद दोनों की मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सैकड़ों चोटों के निशान, टूटी हड्डियां, खून से लथपथ शरीर।

लेकिन इस कहानी का सबसे चमकदार, सबसे साहसी अध्याय 2026 में लिखा गया। मदुरै की पहली अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने 6-7 अप्रैल 2026 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया – 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा। कुल 1.4 करोड़ रुपये का जुर्माना। अदालत ने इसे “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” केस करार दिया। और इस पूरे न्याय की नींव रखी एक महिला हेड कांस्टेबल ने – आर. रेवती

वह उसी स्टेशन में ड्यूटी पर थीं। उन्होंने सब कुछ अपनी आंखों से देखा। चीखें, लाठियां, खून, अपमान, शराब की बोतलें और नशे में धुत पुलिसकर्मी। उन्होंने डर को ठुकराया, नौकरी, परिवार, बच्चों की सुरक्षा को दांव पर लगाया और जज के सामने सच बोल दिया। उनकी गवाही ने पूरे केस को पलट दिया। आज पूरा देश उन्हें “बहादुर महिला कांस्टेबल” कह रहा है।

घटना का पूरा क्रम, रेवती की गवाही के शब्दशः अंश, जांच, मुकदमा, फैसला और उसका व्यापक अर्थ।

पी. जयराज और जे. बेन्निक्स – दो निर्दोष जीवन

जयराज थूथुकुडी जिले के सतनकुलम में मोबाइल फोन रिपेयर और सेल का छोटा सा काम करते थे। बेटा बेन्निक्स उनके साथ काम करता था। दोनों मेहनती, साधारण परिवार के। जयराज की उम्र 58 थी, बेन्निक्स 31 का युवक। 19 जून 2020 को शाम करीब 7:30 बजे सतनकुलम पुलिस ने जयराज को उनके वुड वर्कशॉप से उठाया। आरोप – लॉकडाउन में दुकान थोड़ी देर खुली रखी।

बेन्निक्स को जब पता चला तो वह दोस्त के साथ स्टेशन पहुंचा। अंदर जाकर देखा तो पिता को सब-इंस्पेक्टर बालकृष्णन धक्का दे रहे थे और मार रहे थे। बेटे ने विरोध किया। बस, यहीं से शुरू हुई वह रात जो इतिहास में दर्ज हो गई।

19 जून 2020 की वह रात – स्टेशन के अंदर क्या हुआ?

रेवती उस रात सतनकुलम पुलिस स्टेशन में सेंट्री (पारा) ड्यूटी पर थीं। वे हेड कांस्टेबल थीं। स्टेशन में वरिष्ठ अधिकारी थे – इंस्पेक्टर एस. श्रीधर (तत्कालीन SHO), सब-इंस्पेक्टर पी. रघु गणेश, के. बालकृष्णन, हेड कांस्टेबल एस. मुरुगन, पीसी एस. चेल्लादुराई, एम. मुथुराजा, ए. समदुराई और अन्य। कुल 9 आरोपी बाद में बने।

रेवती ने बाद में मजिस्ट्रेट एम.एस. भारतीदासन के सामने बयान दिया। उनकी गवाही अदालत के 683 पृष्ठों के फैसले का सबसे मजबूत स्तंभ बनी।

रेवती की गवाही के मुख्य अंश (जैसा मीडिया रिपोर्ट्स और अदालती दस्तावेजों में दर्ज):

  • करीब 11:30 बजे रात सब-इंस्पेक्टर रघु गणेश (सिविल ड्रेस में) ने जयराज और बेन्निक्स से पूछा – “कल तुम्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। क्या कहोगे?” दोनों दर्द से तड़प रहे थे।
  • बेन्निक्स ने पिता की रक्षा करने की कोशिश की तो एक कांस्टेबल की शर्ट का बटन टूट गया। यहीं से हिंसा चरम पर पहुंच गई।
  • दोनों को कपड़े उतारकर केवल अंडरगारमेंट्स में छोड़ दिया गया। बेन्निक्स को टेबल पर उल्टा लिटाकर लाठियों और लोहे की रॉड से पीटा गया। खून दीवारों पर छिटक रहा था।
  • एक अधिकारी ने मजाक उड़ाया – “यह तो सौ इडली खाता लगता है, अच्छी मार सह लेगा।”
  • दोनों के निजी अंगों पर जूते से ठोकरें मारी गईं। चीखें पूरे स्टेशन में गूंज रही थीं।
  • रेवती ने बताया – “मैंने कभी इतनी क्रूरता नहीं देखी। बेन्निक्स चल भी नहीं पा रहा था, फिर भी सब-इंस्पेक्टर ने उसे अपना वेस्ट (बनियान) निकालकर स्टेशन का खून साफ करने को मजबूर किया।”
  • जब दोनों अर्ध-बेहोश हो गए तो रेवती ने जयराज से पूछा – “सर, आपको कुछ चाहिए?” उन्होंने कॉफी दी, लेकिन अधिकारियों ने तुरंत छीनकर गिरा दी।
  • अधिकारी बीच-बीच में शराब पीते और फिर मारपीट जारी रखते।
  • सीसीटीवी फुटेज बाद में डिलीट करने की कोशिश की गई, लेकिन रेवती ने आरोपी अधिकारियों को फुटेज देखकर पहचाना।

दूसरी महिला हेड कांस्टेबल ब्यूला सेल्वाकुमारी ने भी रेवती की गवाही की पुष्टि की। दोनों की गवाही ने पुलिस की “सब कुछ ठीक था” वाली कहानी को पूरी तरह ढहा दिया।

मौत और शुरुआती कवर-अप

20 जून को दोनों को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने “फिट” सर्टिफिकेट दे दिया। लेकिन 22 जून को बेन्निक्स की कोविलपट्टी जनरल अस्पताल में मौत हो गई। 23 जून को जयराज भी चल बसे। पोस्टमॉर्टम में सैकड़ों चोटें, आंतरिक रक्तस्राव, यौन अंगों पर अत्याचार के सबूत मिले।

परिवार ने शिकायत की। वीडियो वायरल हुआ जिसमें बेन्निक्स की मां रो-रोकर कह रही थीं – “मेरे बेटे को मार डाला।” पूरे तमिलनाडु में आग लग गई। मद्रास हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए।

सीबीआई जांच और मुकदमा

सीबीआई ने 9 पुलिसकर्मियों पर हत्या, बलात्कार की कोशिश, सबूत नष्ट करने आदि आरोप लगाए। चार्जशीट दाखिल की। मुकदमा मदुरै की अदालत में चला। 2022 में रेवती ने मजिस्ट्रेट के सामने विस्तृत बयान दिया। उन्होंने कहा – “अगर मैं सच नहीं बोलती तो खुद आरोपी बन जाती। मैं अपराध की मददगार बन जाती।”

उन्होंने परिवार की सुरक्षा मांगी। जिला प्रशासन ने उन्हें 2020 से राउंड-द-क्लॉक सुरक्षा दी। कई साथी पुलिसकर्मियों ने पीछे से उनकी आलोचना की, लेकिन कुछ ने सराहा भी।

6-7 अप्रैल 2026 का ऐतिहासिक फैसला

मदुरै की अदालत ने 23 मार्च 2026 को सभी 9 को दोषी ठहराया। 6-7 अप्रैल को सजा सुनाई गई – सभी को फांसी। जज जी. मुथुकुमारन ने कहा – “यह प्रोटेक्टर्स को वायलेटर्स बनने का क्लियर केस है। रेयरेस्ट ऑफ रेयर।” कुल 1.4 करोड़ रुपये का जुर्माना। फैसला हाईकोर्ट में अपील के अधीन होगा, लेकिन यह संदेश साफ है – कस्टोडियल टॉर्चर अब “रूटीन” नहीं चलेगा।

रेवती – एक मां, एक पुलिसकर्मी, एक गवाह

रेवती दो बेटियों की मां हैं। जूनियर अधिकारी होने के बावजूद उन्होंने सीनियरों के खिलाफ गवाही दी। उन्होंने कहा – “सच बोलना मेरा कर्तव्य था। अगर मैं चुप रहती तो अपराध की भागीदार बन जाती।” फैसले के बाद उन्होंने कहा – “यह फैसला बहुत सही है। कानून का राज स्थापित होता है।”

उनकी बहादुरी ने न सिर्फ न्याय दिलाया बल्कि पूरे देश में चर्चा छेड़ दी – क्या पुलिस में आंतरिक जवाबदेही संभव है?

प्रतिक्रियाएं

  • परिवार: “हमारी आंखों में आंसू हैं, लेकिन न्याय मिला। रेवती दीदी को सलाम।”
  • जनता: सोशल मीडिया पर #SaluteRevathi ट्रेंड। “एक महिला ने पूरी पुलिस व्यवस्था को झुकाया।”
  • पुलिस महकमा: कुछ ने चुप्पी साधी, कुछ ने कहा “काले भेड़ थे।”
  • वकील और एक्टिविस्ट: “यह कस्टोडियल मौतों के खिलाफ मील का पत्थर है। भारत में हर साल सैकड़ों कस्टोडियल मौतें होती हैं। अब सुधार की जरूरत।”
  • सतनकुलम केस सिर्फ दो मौतों का केस नहीं है। यह पुलिस की क्रूरता, सत्ता के दुरुपयोग और एक साधारण महिला की हिम्मत की कहानी है। रेवती ने साबित किया कि वर्दी में भी इंसानियत बच सकती है।
  • 9 पुलिसकर्मी फांसी की सजा का इंतजार करेंगे। लेकिन असली जीत रेवती की है – जिन्होंने दिखाया कि सच हमेशा जीतता है, चाहे कितना भी दबाव हो।

व्यापक संदर्भ – भारत में कस्टोडियल हिंसा

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार हर साल 100 से ज्यादा कस्टोडियल मौतें दर्ज होती हैं। ज्यादातर में “प्राकृतिक कारण” लिख दिया जाता है। सतनकुलम केस ने दिखाया कि जब कोई अंदर से बोलता है तो न्याय संभव है।

भारत में कुछ अन्य मामले-

2. बी. अजित कुमार कस्टोडियल मौत कांड (तमिलनाडु, 28 जून 2025) – मंदिर के गार्ड की यातना

सतनकुलम के महज 5 साल बाद तमिलनाडु में फिर वही कहानी। 27 वर्षीय बी. अजित कुमार, शिवगंगा जिले के थिरुपुवनम का मंदिर गार्ड। 28 जून 2025 को चोरी के मामले में “जांच” के नाम पर पुलिस ने अवैध रूप से उठाया। कोई वारंट नहीं, कोई FIR दर्ज नहीं। अनौपचारिक पूछताछ।

पुलिस स्टेशन में ले जाकर अजित को बुरी तरह पीटा गया। लाठियां, रॉड, इलेक्ट्रिक शॉक। यातना इतनी कि 24 घंटे के अंदर मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम में चोटों के निशान, टूटी हड्डियां। परिवार ने आरोप लगाया – “चोरी का झूठा केस बनाकर मार डाला।”

तमिलनाडु पुलिस ने शुरू में “प्राकृतिक कारण” बताया, लेकिन जनता का गुस्सा फूट पड़ा। NCAT और मानवाधिकार संगठनों ने इसे “सतनकुलम 2.0” कहा। CBI या स्थानीय जांच शुरू हुई। गवाहों ने बताया कि अजित को कब्जे में रखकर बयान जबरन लिखवाने की कोशिश हुई।

यह केस दिखाता है कि सतनकुलम फैसले के बावजूद पुलिस में सुधार नहीं हुआ। तमिलनाडु में 2020-2025 के बीच दर्जनों कस्टोडियल मौतें हुईं। अजित की मां ने रोते हुए कहा, “मेरा बेटा मंदिर की रक्षा करता था, पुलिस ने उसे मार डाला।” जन आंदोलन चला। अदालत ने पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड किया, लेकिन फांसी जैसा सजा अभी तक नहीं मिला।

यह घटना साबित करती है कि छोटे-मोटे आरोपों पर भी पुलिस यातना का सहारा लेती है। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में भी ऐसे छोटे कस्बों में पुलिस स्टेशन अक्सर “टॉर्चर सेंटर” बन जाते हैं।

3. अग्नेलो वालदारिस कस्टोडियल यातना (महाराष्ट्र, 2014) – यौन अत्याचार और मारपीट

मुंबई। 18 अप्रैल 2014। 25 वर्षीय अग्नेलो वालदारिस और तीन साथी चोरी के शक में गिरफ्तार। पुलिस स्टेशन में अवैध हिरासत। पूरे रात लाठियां, मुक्के, जूते। फिर यौन अत्याचार – प्राइवेट पार्ट्स पर इलेक्ट्रिक शॉक और ठोकरें।

Human Rights Watch की रिपोर्ट में अग्नेलो के पिता ने बताया, “मेरा बेटा चीख रहा था – ‘पापा, ये पुलिस मुझे मार डालेगी।’” 18 अप्रैल को मौत। पोस्टमॉर्टम: चोटें, आंतरिक क्षति। पुलिस ने “सुicide” बताया, लेकिन परिवार ने सबूत जुटाए।

कोर्ट में केस चला। कुछ अधिकारियों को सजा मिली, लेकिन मुख्य आरोपी बच निकले। HRW ने इसे “भारतीय पुलिस में यौन हिंसा का पैटर्न” बताया। महाराष्ट्र में 2001-2009 के बीच 192 कस्टोडियल मौतें।

अग्नेलो केस ने दिखाया कि यातना सिर्फ मारपीट तक सीमित नहीं – यौन अपमान भी शामिल।

व्यापक विश्लेषण, आंकड़े और सुधार की मांग

भारत में 2005-2018 के बीच 500 कस्टोडियल मौतें, लेकिन एक भी पुलिसकर्मी दोषी नहीं। 2023 में NHRC को 151 कस्टोडियल मौतों की शिकायतें। उत्तर प्रदेश टॉप पर, उत्तराखंड में भी 2019-2023 में 20+ मौतें।

कारण: D.K. Basu गाइडलाइंस की अनदेखी, राजनीतिक दबाव, जवाबदेही की कमी। सतनकुलम में रेवती जैसी गवाह मिली, लेकिन ज्यादातर मामलों में गवाह डर जाते हैं।

समाधान: पुलिस रिफॉर्म (प्रकाश सिंह केस), टॉर्चर बिल पास, CCTV अनिवार्य, स्वतंत्र जांच एजेंसी।

ये घटनाएं सिर्फ मौतें नहीं – सिस्टम की नाकामी हैं। रेवती जैसी बहादुर महिलाएं उम्मीद हैं, लेकिन बदलाव जरूरी। न्याय तभी मिलेगा जब पुलिस “सेवा” करे, न कि “शासन”।

By The Common Man

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