भारत में सड़क हादसों ने 2024 में मचाया कोहराम: 1.77 लाख मौतें, अब तक का सबसे ऊँचा आंकड़ा
नई दिल्ली, 23 फरवरी 2026 — भारत की सड़कें पिछले साल मौत का सबसे बड़ा जाल साबित हुईं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा लोकसभा में पेश आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में देशभर में सड़क दुर्घटनाओं से कुल 1,77,177 लोगों की मौत हुई। यह संख्या 2023 के 1,72,890 (या लगभग 1.73 लाख) से 2.3% अधिक है और अब तक दर्ज सबसे ऊँचा आंकड़ा है। औसतन हर दिन 485 लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा बैठे—यानी हर तीन मिनट में एक मौत।
केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने DMK सांसद ए. राजा के सवाल के लिखित जवाब में ये चौंकाने वाले आंकड़े साझा किए। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से प्राप्त डेटा (पश्चिम बंगाल का कुछ डेटा eDAR पोर्टल से) पर आधारित ये रिपोर्ट दर्शाती है कि सड़क सुरक्षा के प्रयासों के बावजूद स्थिति और खराब हुई है।
सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य: उत्तर प्रदेश टॉप पर
उत्तर प्रदेश में सबसे भयावह स्थिति रही, जहाँ 24,118 मौतें दर्ज की गईं—देश की कुल मौतों का करीब 13.6%। इसके बाद तमिलनाडु (18,449), महाराष्ट्र (15,715), मध्य प्रदेश (14,791) और कर्नाटक (12,390) का नंबर आता है। राजस्थान (11,790) और बिहार (9,347) भी उच्च प्रभावित राज्यों में शामिल हैं।
अन्य प्रमुख राज्य:
- तेलंगाना: 7,949
- गुजरात: 7,717
- छत्तीसगढ़: 6,945
- पश्चिम बंगाल: 6,678
- ओडिशा: 6,142
सबसे कम प्रभावित: लक्षद्वीप में 0 मौतें, जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में मात्र 29 मौतें।
उत्तराखंड में स्थिति: पहाड़ी राज्य में बढ़ते हादसे और सरकारी विभागों की नाकामी
उत्तराखंड, जो पहाड़ी इलाकों के कारण पहले से ही जोखिम भरा है, 2024 में 1,747 दुर्घटनाओं में 1,090 मौतें दर्ज की गईं (MoRTH और राज्य ट्रैफिक डायरेक्टोरेट के आंकड़ों के अनुसार)। राज्य में रैश ड्राइविंग और स्पीडिंग से ही 983 मौतें हुईं, जबकि कुल 1,594 हादसों में से अधिकांश रेकलेस बिहेवियर से जुड़े थे। राज्य में मौत दर प्रति 100 हादसों पर काफी ऊँची है—देश में टॉप 6 राज्यों में शामिल, जबकि समान भौगोलिक स्थिति वाले हिमाचल प्रदेश में यह रैंक 20वें स्थान पर है।
उत्तराखंड में हादसों के प्रमुख कारण:
- पहाड़ी सड़कों की जटिलता: तीखे मोड़, संकरी सड़कें, भूस्खलन, बिना चेतावनी के कर्व्स और अपर्याप्त साइनेज।
- ओवर स्पीडिंग और रैश ड्राइविंग (खासकर टूरिस्ट वाहनों और बसों में)।
- खराब मेंटेनेंस: गड्ढे, सड़कें टूटना, और निर्माण गुणवत्ता में कमी।
- मिश्रित ट्रैफिक: भारी बसें, टेम्पो ट्रैवलर, टूरिस्ट वाहन और लोकल वाहन एक साथ।
सरकारी विभागों की नाकामी और भ्रष्टाचार:
उत्तराखंड परिवहन विभाग, लोक निर्माण विभाग (PWD) और ट्रैफिक पुलिस में सड़क सुरक्षा उपायों का क्रियान्वयन कमजोर रहा है। ब्लैक स्पॉट्स की पहचान और सुधार में देरी, निर्माण में गुणवत्ता नियंत्रण की कमी (भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ), और नियमों का सख्ती से पालन न होना प्रमुख मुद्दे हैं। कई हादसों (जैसे 2024 में रुद्रप्रयाग टेम्पो ट्रैवलर हादसा जिसमें 15 मौतें, या अल्मोड़ा बस हादसा) के बाद जांच और जिम्मेदारी तय करने में विफलता दिखी है—कोई ठोस इंक्वायरी या दोषियों पर कार्रवाई नहीं होती। भ्रष्टाचार के कारण सड़क निर्माण और मेंटेनेंस में फंड का दुरुपयोग, ठेकेदारों को बिना सजा के काम जारी रखने की अनुमति, और लाइसेंस/परमिट में अनियमितताएँ आम हैं। सरकारी विभागों की निष्क्रियता और जवाबदेही की कमी से हादसे बढ़ते जा रहे हैं, जबकि पड़ोसी राज्यों में बेहतर प्रबंधन से स्थिति नियंत्रित है।
वैश्विक तुलना में भारत का स्थान
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में हर साल लगभग 1.19 मिलियन (11.9 लाख) लोग सड़क हादसों में मरते हैं। भारत अकेले ही वैश्विक कुल का 15% योगदान देता है, जबकि देश की आबादी विश्व की कुल आबादी का सिर्फ 17-18% है। प्रति 1 लाख आबादी पर मौतों की दर भारत में 11.89 है, जो वैश्विक औसत (17-18) से कम है लेकिन कुल संख्या के लिहाज से भारत सबसे ऊपर है।
तुलना में:
- चीन: प्रति 1 लाख पर मात्र 4.3 मौतें।
- अमेरिका: 12.76।
- यूरोपीय संघ: औसतन 4.5 प्रति 1 लाख (2024 में कुल 19,940 मौतें)।
मौतों के प्रमुख कारण: स्पीडिंग, नशा और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर
विशेषज्ञों के अनुसार, ओवर स्पीडिंग 70% मौतों का मुख्य कारण है। अन्य कारक:
- नशे में ड्राइविंग और मोबाइल फोन इस्तेमाल।
- गड्ढे, अंधे मोड़, रोशनी की कमी और खराब सड़कें (2020-2024 में गड्ढों से जुड़े हादसों में 53% वृद्धि)।
- ट्रैफिक नियमों का कमजोर पालन—हेलमेट/सीटबेल्ट न पहनना, गलत साइड ड्राइविंग।
- मिश्रित ट्रैफिक: दोपहिया वाहनों से 44-45% मौतें, पैदल यात्रियों की बड़ी संख्या।
राष्ट्रीय राजमार्गों पर (कुल सड़कों का 2%) 30-35% मौतें होती हैं, क्योंकि तेज गति से प्रभाव ज्यादा गंभीर होता है। युवा (18-45 वर्ष) सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, जो अर्थव्यवस्था पर भी बोझ डालता है।
क्या किया जा रहा है और आगे क्या? विशेष रूप से उत्तराखंड के लिए सुझाव
सरकार ने सख्त नियम, स्पीड कैमरे, जागरूकता अभियान और इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार शुरू किए हैं, लेकिन क्रियान्वयन में कमी बनी हुई है। UN के ‘Decade of Action for Road Safety 2021-2030’ लक्ष्य के तहत 2030 तक मौतों को आधा करने का वादा है, लेकिन प्रगति धीमी है।
उत्तराखंड में सुधार के लिए विशेष सुझाव:
- ब्लैक स्पॉट्स की तत्काल पहचान और सुधार (जियो-टैगिंग और इंजीनियरिंग फिक्स)।
- निर्माण और मेंटेनेंस में सख्त गुणवत्ता नियंत्रण, थर्ड-पार्टी ऑडिट और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस।
- हर बड़े हादसे के बाद स्वतंत्र जांच और दोषियों पर कार्रवाई।
- पहाड़ी क्षेत्रों में स्पीड लिमिट सख्ती से लागू, GPS ट्रैकिंग वाली बसों/टैक्सियों के लिए अनिवार्य।
- जागरूकता अभियान, बेहतर इमरजेंसी रिस्पॉन्स (ट्रॉमा सेंटर्स) और 4E (Engineering, Enforcement, Education, Emergency Care) पर फोकस।
विशेषज्ञों का कहना है कि इंजीनियरिंग, एनफोर्समेंट, एजुकेशन और इमरजेंसी केयर (4E) पर फोकस बढ़ाना होगा। नागरिक समाज की भागीदारी भी जरूरी है।
सड़कें मौत का जाल न बनें, इसके लिए हर व्यक्ति को जिम्मेदारी निभानी होगी—स्पीड कंट्रोल करें, नियम मानें, हेलमेट/सीटबेल्ट लगाएं और दूसरों को भी याद दिलाएं, और नशे या नींद आने की स्थिति में बिल्कुल भी वाहन न चलाएं।
जान बचाना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है!
