देहरादून, 26 फरवरी 2026 – कभी अपनी ताज़ी हवा, चीड़ के जंगलों और शांत वादियों के लिए मशहूर देहरादून आज उत्तर भारत के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार हो रहा है। फरवरी 2026 में शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ज्यादातर दिनों “अस्वस्थ” रेंज में रहा—150 से 180 के आसपास, जबकि सर्दियों की रातों में यह और भी खराब हो जाता है। PM2.5 का स्तर अक्सर सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा रहता है, जिससे बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए अलर्ट जारी हो रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि दून घाटी की कटोरे जैसी भौगोलिक स्थिति प्रदूषकों को फंसाती है। बढ़ते वाहन, निर्माण से उड़ने वाली धूल और सर्दियों में तापमान उलटाव (इनवर्शन) ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के पूरी तरह चालू होने से ट्रैफिक और बढ़ गया है, लेकिन साफ हवा की कीमत चुकानी पड़ रही है।
अन्य हिल स्टेशनों से तुलना में देहरादून कितना पीछे?
देहरादून अब हिमालयी इलाकों में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर बन चुका है:
- देहरादून: 2026 की शुरुआत में AQI अक्सर 150–220+ (अस्वस्थ); सर्दियों में पीक पर 260–300 तक पहुंचा।
- मसूरी और शिमला: ज्यादातर “अच्छा” से “मध्यम” (30–80), ऊंचाई और हवा के बहाव की वजह से।
- नैनीताल: कभी-कभी मध्यम स्पाइक, लेकिन देहरादून से काफी साफ।
- अन्य हिमालयी जगहें (जैसे गंगटोक, शिलांग): AQI 20–50 के बीच, उत्कृष्ट स्तर पर।
2025 के अंत में देहरादून का AQI 300 के करीब पहुंचा था—एक हिल शहर के लिए यह सोच से परे है। दिल्ली से लोग स्मॉग से भागकर यहां आते हैं, लेकिन यहां भी राहत नहीं मिलती।
दिल्ली से भी बदतर: पार्कों और सुविधाओं की भारी कमी
देहरादून की सबसे बड़ी समस्या अब यह है कि यहां सार्वजनिक पार्क और हरित स्थलों की कमी दिल्ली जैसी हो गई है—बल्कि कुछ मामलों में दिल्ली से भी ज्यादा खराब। हालिया अध्ययनों के अनुसार:
- देहरादून में कुल हरित क्षेत्र (UGS) प्रति व्यक्ति 262 m² है, लेकिन सार्वजनिक उपयोग वाले पार्क (PUGS) सिर्फ 2.08 m² प्रति व्यक्ति—जो दिल्ली के 3.69 m² से भी कम है।
- कई वार्डों में प्रति व्यक्ति हरित स्थान सिर्फ 0.5 से 1.5 m² तक रह गया है, जबकि WHO का न्यूनतम मानक 9 m² है।
- दिल्ली में भी पार्क असमान रूप से बंटे हैं (दक्षिण दिल्ली में ज्यादा, उत्तर-पूर्व में कम), लेकिन कुल मिलाकर यहां बड़े-बड़े पार्क जैसे लोधी गार्डन, नेहरू पार्क, इंडिया गेट क्षेत्र हैं जो शहर को सांस लेने की जगह देते हैं। देहरादून में ऐसे बड़े सार्वजनिक पार्कों की कमी है—ज्यादातर हरियाली निजी संस्थानों, कॉलेजों या बागानों में छिपी है, आम लोगों की पहुंच से दूर।
- हाल ही में राजपुर रोड पर “सस्टेनेबल पार्क” प्रोजेक्ट के नाम पर आखिरी बड़े हरे इलाके को कंक्रीट में बदलने की योजना पर विवाद हुआ, जिसे लोग “आखिरी हरे फेफड़े का विनाश” कह रहे हैं।
इस कमी से प्रदूषण और भी बुरा हो जाता है—क्योंकि दिल्ली में कम से कम कुछ पार्क और हरित पट्टियां हैं जो धूल और प्रदूषण को कम करती हैं, जबकि देहरादून में ऐसी सुविधाएं न के बराबर हैं।
देहरादून की अनोखी पहचान—हरियाली—अब खत्म होती जा रही है
देहरादून की असली पहचान थी उसकी घनी हरियाली, चाय बागान, साल के जंगल और खुले मैदान। लेकिन अब यह सब तेजी से गायब हो रहा है:
- 2001 से 2023 तक जिले में 6,200 हेक्टेयर से ज्यादा पेड़ों का कवर कम हुआ।
- घनी वन क्षेत्र घटकर नाममात्र रह गया; कई इलाकों में खेत-बागान कंक्रीट में बदल गए।
- मशहूर दून चाय बागानों का उत्पादन अब नाममात्र का है—जमीन रियल एस्टेट में बिक रही है।
- 90 के दशक का “गोल्डन फॉरेस्ट” घोटाला आज भी याद दिलाता है कि कैसे प्लांटेशन के नाम पर जंगल बर्बाद हुए।
लोग अब कहते हैं कि देहरादून की “ग्रे हेयर एंड ग्रीन वैली” वाली छवि खत्म हो गई है—अब यहां सिर्फ ट्रैफिक, धूल और धुंध बची है। पर्यावरणविद् चेतावनी देते हैं कि अगर हरियाली की यह पहचान खो गई तो शहर की आत्मा ही खत्म हो जाएगी।
मौसम में बदलाव: गर्म रातें, अनियमित बारिश और अर्बन हीट आइलैंड
पिछले 20 सालों के डेटा से साफ है कि देहरादून का मौसम तेजी से बदल रहा है:
- पोस्ट-मॉनसून में तापमान में काफी बढ़ोतरी।
- रातें गर्म हो रही हैं—कंक्रीट और कम हरियाली से अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव।
- बारिश अनियमित—तेज बौछारें बाढ़ लाती हैं, सूखे पानी की कमी बढ़ाते हैं।
निर्माण और जीवनयापन की लागत में उछाल
निर्माण का तेज दौर सब कुछ महंगा कर रहा है:
- निर्माण लागत: ₹1,400–2,500+ प्रति वर्ग फुट।
- रियल एस्टेट: सालाना 10–15% बढ़ोतरी।
क्या अभी भी कुछ बचाया जा सकता है?
देहरादून स्मार्ट सिटी बनने की राह पर है, लेकिन पर्यावरण का नुकसान बहुत बड़ा हो रहा है। पर्यावरणविद्, स्थानीय संगठन और कोर्ट बार-बार चेतावनी दे रहे हैं—सख्त नियम, बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना, बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पार्कों की संख्या बढ़ाना और अवैध कब्जों पर रोक जरूरी है।
एक पुराने निवासी ने कहा: “हम यहां ताजी हवा और खुली वादियों के लिए आए थे। अब घर में एयर प्यूरीफायर चलाना पड़ता है, और बाहर सैर के लिए पार्क भी नहीं बचे।”
देहरादून की कहानी अन्य हिल शहरों के लिए चेतावनी है—अनियंत्रित विकास से स्वर्ग भी नर्क बन सकता है। संतुलित योजना के बिना “हिल्स की रानी” अपना ताज और अपनी हरियाली वाली पहचान खो सकती है।