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एनसीईआरटी कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का तीखा बयान और न्यायपालिका की भूमिका पर बहस

नई दिल्ली, 2 मार्च 2026: हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में एक विवादित अध्याय ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया है। अध्याय का शीर्षक “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” था, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लंबित मामलों का बोझ और जजों की कमी जैसी चुनौतियों का जिक्र किया गया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने कड़ी नाराजगी जताई और सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए कार्रवाई की।

विवाद की शुरुआत और सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
फरवरी 2026 के अंत में, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि कक्षा 8 (13-14 वर्ष के बच्चे) के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार सिखाया जा रहा है, जबकि अन्य संस्थाओं जैसे राजनीति, नौकरशाही, जांच एजेंसियों या मंत्रियों में भ्रष्टाचार का कोई जिक्र नहीं है। यह एकतरफा और जानबूझकर न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश लगती है।

सीजेआई सूर्यकांत ने इसे “गहराई से सोची-समझी साजिश” करार देते हुए कहा, “मैं किसी को भी न्यायपालिका की छवि खराब करने नहीं दूंगा।” अदालत ने 25 फरवरी को स्वतः संज्ञान लिया और 26 फरवरी को कक्षा 8 की पूरी पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। आदेश में सभी हार्ड कॉपी जब्त करने, सॉफ्ट कॉपी हटाने, वितरण रोकने और एनसीईआरटी निदेशक तथा शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा सचिव को अवमानना नोटिस जारी करने का निर्देश दिया गया। एनसीईआरटी ने माफी मांगी और किताब को अपनी वेबसाइट से हटा लिया। अध्याय को दोबारा लिखने की बात कही गई है।

सीजेआई ने क्यों निर्देश दिया एनसीईआरटी को अध्याय हटाने का?
सीजेआई सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने का “गहरा और सोचा-समझा प्रयास” बताया। अदालत ने कहा कि अध्याय में पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई के बयानों को संदर्भ से बाहर पेश किया गया था। यह बच्चों के मन में न्यायपालिका के प्रति नकारात्मक छवि बनाता है। स्वतः संज्ञान के बाद अदालत ने एनसीईआरटी को अध्याय हटाने, किताब जब्त करने और जिम्मेदारों की जांच का आदेश दिया। एनसीईआरटी ने तुरंत किताब वापस ली और माफी मांगी।

जनता की प्रतिक्रिया और सोशल मीडिया पर बहस
इस घटना पर सोशल मीडिया और जनता में मिली-जुली प्रतिक्रिया आई। कुछ लोगों ने इसे न्यायपालिका की संवेदनशीलता बताया, जबकि कई ने कहा कि भ्रष्टाचार की बात छिपाई नहीं जानी चाहिए। कपिल सिब्बल के शुरुआती पोस्ट (जिसमें उन्होंने अन्य संस्थाओं में भ्रष्टाचार का जिक्र किया) वायरल हुए। कई यूजर्स ने पूछा कि अगर न्यायपालिका साफ है, तो ऐसी बात से डर क्यों? वहीं, न्यायपालिका समर्थकों ने कहा कि बच्चों को ऐसी नकारात्मक बातें नहीं सिखानी चाहिए।

न्यायपालिका का महत्व और उसमें मौजूद समस्याएं
न्यायपालिका भारत के लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ है। यह संविधान की रक्षा करती है, मौलिक अधिकारों की गारंटी देती है और अन्य संस्थाओं पर नजर रखती है। लेकिन लंबित मामलों का बोझ (कोटि-कोटि केस), जजों की कमी और कभी-कभी भ्रष्टाचार के आरोप इसे चुनौती देते हैं। सिब्बल जैसे विशेषज्ञ कहते हैं कि संवैधानिक नैतिकता का पालन न होने से जनता का विश्वास कम होता है। हाल के वर्षों में हेट स्पीच, छात्र गिरफ्तारियां, विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर अदालत की चुप्पी या हाई कोर्ट को टालना आलोचना का विषय रहा है।

फिर भी, न्यायपालिका ही एक ऐसी संस्था है जो अभी तक पूरी तरह “कब्जे” में नहीं आई है। सिब्बल ने कहा कि अन्य संस्थाएं कैप्चर हो चुकी हैं, लेकिन न्यायपालिका पर हमला लोकतंत्र के लिए खतरा है।

यह विवाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शिक्षा में सच्चाई और संस्थागत जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से अध्याय हट गया, लेकिन सवाल बाकी हैं—क्या भ्रष्टाचार पर खुली चर्चा जरूरी है या संस्थाओं की छवि पहले?

अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, लाखों-करोड़ों लंबित मामले और जजों की कमी जैसी चुनौतियों का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इसे “गहराई से सोची-समझी साजिश” बताते हुए स्वतः संज्ञान लिया और पूरी किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। एनसीईआरटी ने माफी मांगी और अध्याय हटा लिया, लेकिन यह विवाद न्यायपालिका की छवि, भ्रष्टाचार के आरोपों और सुधारों पर बड़ी बहस छेड़ रहा है।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के उल्लेखनीय मामले और आंकड़े
भारत में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं। हाल के वर्षों में कई हाई-प्रोफाइल मामले चर्चा में रहे:

  • यशवंत वर्मा मामला (2025): इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज के आउटहाउस में आग लगने पर करोड़ों रुपये नकद जलते पाए गए। फायर ब्रिगेड ने इसे देखा, लेकिन जज पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हुई। वे अब क्लर्किकल काम कर रहे हैं। यह मामला सोशल मीडिया पर “भ्रष्टाचार का प्रमाण” बताकर वायरल हुआ।
  • निचली न्यायपालिका में हटाए गए जज: कई निचले स्तर के जजों को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया गया है, लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट स्तर पर शिकायतों पर कार्रवाई कम होती है।
  • आंकड़े: लोकसभा में फरवरी 2026 में पेश डेटा के अनुसार, 2016 से 2025 तक सिटिंग जजों के खिलाफ 8,600 से ज्यादा शिकायतें आईं। 2024 में 1,170 और 2025 में 1,102 शिकायतें दर्ज हुईं। 2017-2021 के बीच CPGRAMS पोर्टल पर 1,600+ शिकायतें आईं। पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई ने जुलाई 2025 में कहा था कि भ्रष्टाचार के मामले जनता के विश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन पारदर्शी कार्रवाई से विश्वास बहाल किया जा सकता है।

वरिष्ठ न्यायाधीशों ने भी स्वीकार किया है कि भ्रष्टाचार मौजूद है, लेकिन इसे “इन-हाउस” संभालना चाहिए। पूर्व जस्टिस संजीब बनर्जी ने कहा, “निश्चित रूप से भ्रष्टाचार है, लेकिन फोकस सिर्फ निचले स्तर पर होता है, ऊपरी स्तर की शिकायतें दबा दी जाती हैं।”

जजों के चयन की प्रक्रिया: कॉलेजियम सिस्टम और उसकी आलोचनाएं
भारत में उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम सिस्टम से होती है। यह सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (1993 का दूसरा जजेस केस और 1998 का तीसरा जजेस केस) से विकसित हुआ, जिसमें सीजेआई और वरिष्ठ जजों का पैनल (कॉलेजियम) नाम सुझाता है और सरकार नियुक्त करती है।

मुख्य आलोचनाएं:

  • अपारदर्शिता (Opacity): फैसले बंद कमरों में होते हैं, कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड या स्पष्ट मापदंड नहीं।
  • नेपोटिज्म और फैवरिटिज्म: रिश्तेदारों या “ज्ञात” लोगों को तरजीह देने के आरोप लगते हैं। हाल में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक नियुक्ति पर असहमति जताई, लेकिन विवरण गोपनीय रहा।
  • अल्पसंख्यक/पिछड़े वर्गों का कम प्रतिनिधित्व: सुप्रीम कोर्ट में ऊपरी जातियों का वर्चस्व है।
  • एनजेएसी का खारिज होना: 2014 में संसद ने नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (एनजेएसी) बनाया, जिसमें सरकार, जज और अन्य शामिल थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में इसे असंवैधानिक करार दिया, क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला था।

कपिल सिब्बल जैसे विशेषज्ञ कहते हैं कि कॉलेजियम सिस्टम न्यायपालिका को “कैप्चर” होने से बचाता है, लेकिन पारदर्शिता की कमी से जनता का विश्वास घटता है।

न्यायपालिका के अन्य प्रमुख मुद्दे

  • लंबित मामले: एनसीईआरटी किताब के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में ~81,000, हाई कोर्ट में 62.4 लाख और जिला/निचली अदालतों में 4.7 करोड़ मामले लंबित हैं। कुल 5 करोड़+ केस।
  • जजों की कमी: स्वीकृत पदों में बड़ी संख्या खाली। निचली अदालतों में 20-30% पद खाली।
  • अन्य चुनौतियां: जटिल प्रक्रियाएं, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, जातिगत भेदभाव (निचले स्तर पर), और कभी-कभी राजनीतिक दबाव। गरीबों के लिए न्याय पहुंच मुश्किल हो जाती है।
  • सकारात्मक प्रयास: ई-कोर्ट, तकनीक से पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश, लेकिन भ्रष्टाचार के मामले अभी भी चुनौती।

By The Common Man

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